मंगलवार, 1 नवंबर 2011

नींव.....


हर मंदिर की नींव में रखी हुई हर ईंट उतनी ही महत्त्वपूर्ण होती हैं जितना कि मंदिर के ऊपर दिखाई देने वाला गुम्बद...और वो आकाश की तरफ मुंह उठाये लोगों के द्वारा की जा रही सराहना पर इतराता रहता है... अब अगर गुम्बद में रखी ईंट खुद पर इतराए कि मंदिर की सुन्दरता उसी से है..तो गलत होगा !! अगर हम धीरे से नींव में रखी ईंटों में से एक भी ईंट को अपनी जगह से खिसका दें तो पूरे मंदिर की इमारत हिल जायेगी या ढह भी सकती है..लेकिन यह कितने लोग समझते हैं..जीवन में हर कोई अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण है चाहे वो छोटा हो या फिर बड़ा !इस संसार की हर छोटी से छोटी वस्तु भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी कि बड़ी...! ईश्वर ने सभी को अपने किसी उद्देश्य से बनाया है ! संसार का कोई भी प्राणी और कोई भी वस्तु किसी भी चीज़ को उतना over power नहीं करती जितना कि इंसान.. एक इंसान ही है जो किसी की अवहेलना कर सकता है और बेवजह over powre करने की कोशिश करता है क्योंकि उसे हमेशा लगा रहता है कि कहीं कुछ है जो उसके हाथ से निकलता जा रहा है... बस यहीं से उसे हर चीज़ को अपनी मुठ्ठी में करने की चाह होने लगती है...!! चाहे वह किसी पद पर हो,घर हो,परिवार हो,समाज हो,छोटा हो,बड़ा हो...!! समय,परिस्थिति और स्थान अलग-अलग हो सकते हैं....पर करते सब वही हैं...!! ऐसा करके उसे लगता है कि सब उसके control में है...!! लेकिन यह उसका भ्रम है...! जबरदस्ती control की हुई वस्तु,परिस्थिति और इंसान कभी भी बेलगाम हो जाते हैं.. और फिर सिलसिला शुरू होता है stress और frustration का....साथ ही और भी जाने क्या-क्या problem ....कुछ शारीरिक,कुछ मानसिक और फिर दोषारोपण....कभी समाज पर,कभी परिस्थिति पर,कभी साथ में रह रहे लोगों पर और अगर कुछ मिले तो ईश्वर और भाग्य तो है ही.....!! फिर गिनती चालू होती है कि जीवन में उसने इतना दूसरों के लिए किया और बदले में उसे मिला क्या ???लेकिन कब तक ?? कब तक इंसान गिनाएगा कि इतना करने के बाद भी हाथ क्या आया...? क्या अभी तक वह अकेले अपने ही भरोसे पर जीवन जी गया है..?? क्या जीवन की इतनी यात्रा उसने अकेले अपने ही बलबूते पर कर ली है...?? क्या उसने ही हमेशा दिया है..?? उसके साथ में रहने वालों ने क्या कुछ भी contribute नहीं किया उसके जीवन में..?? लिखने,बताने और कहने वाले अपनी प्रसंशा में जाने क्या-क्या कह जाते हैं...? कभी उनके साथ में रहने वालों से भी पूछा जाए कि उनके जीवन में खुद उसका कितना योगदान रहा है... ?? शायद हर इंसान कुछ अपने जीवन के कुछ ऐसे ही अनुभव सुनाएगा...और जब आप सुनेंगे तो आप भी अपने आप को उससे co-relate कर पाएंगे, क्यूँ कि आप के जीवन के अनुभव उससे कुछ अलग नहीं होंगे...कहीं कहीं तो match कर ही जायेंगे..फिर आपकी सारी सहानुभूति ऐसे इंसान से जुड़ जायेगी क्योंकि आप खुद को उसी की जगह पर रख पाते हैं....और उसी के साथ उसी के भावों में डूबने-उतरने लगते है..कहीं कहीं वो आप को भी सुकून देता है कि आप अकेले नहीं हैं ...और भी हैं आप की तरह...!!लेकिन कब तक..??? कब तक दोषारोपण करेंगे दूसरे पर..???जब तक हम thankful नहीं होंगे ईश्वर के प्रति कि उसने जो दिया है..... हमारे लिए वही सही है,उचित है !! और उसी भाव से समय और परिस्थिति के अनुसार खुद को ढाल लें तभी समय और परिस्थिति हमारे अनुकूल व्यवहार करती है..दूसरों पर दोषारोपण करके हम खुद को इस भाव से मुक्त कर लेते हैं..!! दूसरों को बदलने से अच्छा है कि खुद को बदल डालें..!! इस संसार कुछ भी बेमानी नहीं है..!!ज्ञान भी तभी मिलता है जब जीवन में उसकी सबसे ज्यादा ज़रुरत होती है.....!! लेकिन ये हमारे ऊपर है हम उसका इस्तेमाल कब,कैसे और किस समय करें..??? ये हमारे ऊपर है कि उसे हम use करें या missuse ...??

13 टिप्‍पणियां:

  1. दूसरों को बदलने से अच्छा है कि खुद को बदल डालें..!!

    बहुत ही सुन्दर आलेख है आपका........हर बात सटीक और तर्कयुक्त है सहमत हूँ आपकी सभी बातों से..............कोशिश है की -

    'तू भी बदल फलक की ज़माना बदल गया '

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  2. पूनम जी...नीव मजबूत होगी तो ईमारत भी मजबूत होगी..
    नई पीढ़ी के लोगों की नीव मजबूत करना होगा
    तभी समाज और देश आगे बढ़ेगा ........
    सुंदर लेख...अच्छी पोस्ट.....
    मेरे नए पर स्वागत है .....

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  3. Excellent contemporary writing!! English words are aptly and appropriately used.

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  4. sach kaha...kisi aur ko badalne ki koshis se achcha hai khud ko badal dale..kyonki sabse aasan to khud ko badalna hi hai...achchi prastuti
    मिश्री की डली ज़िंदगी हो चली

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  5. poonamji,
    aapne nirantar-kah-rahaa follow kiyaa hai ,uske liye dhanywaad.Aapse request hai www.nirantarajmer.com follow karein .
    rajtela1@gmail.com

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  6. आलेख की अंतिम पंक्तियों मे आपने जो निष्कर्ष दिया है वह सटीक है।

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    1. धन्यवाद....
      अपने अगल-बगल देख कर ही लिखा है ये लेख...
      जिन्दगी मैं ऐसा ही कुछ होता रहता है सबकी....

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  7. "जब आप सुनेंगे तो आप भी अपने आप को उससे co-relate कर पाएंगे, क्यूँ कि आप के जीवन के अनुभव उससे कुछ अलग नहीं होंगे...कहीं न कहीं तो match कर ही जायेंगे..फिर आपकी सारी सहानुभूति ऐसे इंसान से जुड़ जायेगी क्योंकि आप खुद को उसी की जगह पर रख पाते हैं....और उसी के साथ उसी के भावों में डूबने-उतरने लगते है..कहीं न कहीं वो आप को भी सुकून देता है कि आप अकेले नहीं हैं ...और भी हैं आप की तरह...!!लेकिन कब तक..??? कब तक दोषारोपण करेंगे दूसरे पर..???दूसरों को बदलने से अच्छा है कि खुद को बदल डालें..!!
    बात तो सही ही है... पर जब खुद को बदलने पर भी हालात/लोग न बदले तो?

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  8. दूसरों को बदलने से पहले खुद को बदल डालें।
    उम्दा विचार

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    1. शुक्रिया शेफाली इतने समय बाद भी पढ़ने के लिए...ये विचार सिर्फ मेरे हैं और मेरे अनुभव से हैं !

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